
चीत्कार ! एक कन्या भ्रूण की
रुको, रुको ये क्या करने जा रहे हो ?
मुझे पहचानते हो?
नहीं पहचाना?...
अरे! मैं तुम्हारा ही अंश हूँ,
तुम्हारी अजन्मी बेटी !
क्या मुझे पैदा होने से पहले ही
मुझे समाप्त कर दोगे ?
तुमने मुझे कैसे भुला दिया !
मैं ही तो हूँ, जो......
कभी तुम्हारी कलाई पर राखी बनकर,
तुम्हारी लम्बी आयु की कामना करती हूँ !
कभी तुम्हारी अर्धांगिनी बनकर,
तुम्हारे प्रतिरूप का निर्माण करती हूँ !
कभी माँ बनकर तुम्हें संसार में लाकर,
तुम्हें अपना रक्त पिलाकर तुम्हारा पोषण किया !
ताकि तुम संसार के सभी सुखों को भोग सको.
और अपने संघर्ष से पृथ्वी पर स्वर्ग का निर्माण कर सको !
भूल गए? मैंने ही तो तुम्हारे जीवन में रंग भरे, पत्नी बनकर !
में ही तो अपनी किलकारियों से तुम्हारे आँगन को भरती हूँ!
मैं ही तो सहोदरा बनकर तुम्हारे बचपन को स्नेहसिक्त करती हूँ!
क्या तुम सब कुछ भूल गए?
ज़रा सोचो तो मैं ही न रही तो...
तो मानवता को क्या होगा?
तो का मनु का सपना यहीं खत्म हो जायेगा?
मानवता की समाप्ति हो जाएगी!
मेरे बिना का अगली पीढ़ी को ला पाओगे?
इसलिए अभी रोक लो अपने कदम!
जो मुझे संसार मैं आने से पहले ही समाप्त करने को आतुर हैं!
नहीं तो सब कुछ ख़त्म हो जायेगा
मानवता ख़त्म हो जाएगी!
मानवता ख़त्म हो जाएगी!.......
- राजेश्वरी सक्सेना 'स्वराज'

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